यह कविता है उनके लिए जो परिस्थितियों का शिकार बनने की दुहाई दे कर स्वयं को भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता के चूल्हे में झोंक देते हैं और हमारे देश में ऊँचे स्थानों में बैठ कर अपनी अराजकता और स्वार्थ पूर्ति के लिए न जाने कितने जरूरतमंद और आम आदमी का शोषण करते हैं, अब समय आ गया है उन्हें दर्पण दिखाने का और उन्हें एहसास कराने का की जो वो कर रहे हैं वो गलत है, मेरी इस कविता के माध्यम से मैंने उन्हें शीशे में खुद को दिखाने की चेष्टा की है
आज अचानक मार्ग में,
जब मैं विचर रहा था,
भ्रस्टाचार से विभूषित,
लोभ से आकर्षित,
दंभ से मादित,
नैतिकता से परे,
मानवता से दूर,
दया ममता को त्याग कर,
कलुषित मन को कपड़ों में छिपा कर |
तभी तामस की निर्विघ्न शांत छाया से
स्वयं के अंतर-मन को प्रत्यक्ष देखा
निर्बल,असहाय,शोषित,बेड़ियों से जकड़ा हुआ
कुरूप,अशांत,प्रश्नों से चिन्हित,
वह मेरा ही अंतर स्वरुप था,
पर मैं उससे कोसों दूर था,
वह नग्न सत्य
और मैं भ्रष्ट मिथ्या
वह परिस्थितियों के द्वन्द युद्ध में विजयी
परन्तु घायल शूरवीर
मैं विद्रोही हारा हुआ
वह चेतन ६थ वह प्रेमी था
वह नैतिकता से वशीभूत था
उसे देखकर मैं बारम्बार लज्जित होता रहा
और वह दर्दनाक पीड़ा में भी
आल्हादित शंख्ध्व्नी करता हुआ
बाधा जा रहा था, अडिग...................
वह बढ़ता रहा
चलता रहा
और अंत में आत्महत्या कर ली
भ्रस्टाचार के कूप में
........................................और मैं स्तब्ध रह गया |
akhiri panktiyan behat marmik hain.
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