Saturday, July 31, 2010

चीखें

यह शीर्षक आप को शायद उतना अच्छा न लगे पर यह मेरी लिखी हुई सभी कविताओं में से सबसे प्रिय है,यहाँ चीखें दर्शाती हैं वो आवाज जो हर उस भारतीय की चीखों से जुडी है जिसका शोषण हो रहा है, जिसे दबाया जा रहा है और हम उस मूक दर्शक के समान या तो खड़े होके तमाशा देखते हैं या फिर वहाँ से मुह मोड़ के चले जाते हैं हम में से ऐसा कोई नहीं जो हो रहे इन अत्याचारों या फिर इस अराजकता के प्रति आवाज उठाये | और ऐसा नहीं के हमारे पास बहाने नहीं है बहाने भी हैं किसी के साथ बुरा होता है तोह हम उसकी टिका-टिप्पणी भी करने से बाज नहीं आते शायद आज इसी वजह से भ्रस्टाचार,अराजकता और हिंसा अपने चरम पे है | 




दूर से आती हैं चीखें 
   पर चारो तरफ है सन्नाटा 
दशदिश में गूंजती हैं चीखें
   पर चारों तरफ है सन्नाटा |


मैं हैरान हूँ परेशान हूँ 
किसकी हैं ये चीखें
मन है विचलित मानो जाने अनजाने 
परिचित है वो इन चीखों से
पर वो चुप है
क्योंकि चारों तरफ है सन्नाटा |


ह्रदय कहता है की 
जलाओ एक ऐसा दीपक जो 
मिटा दे इस अन्धकार को 
पर मैं भयभीत हूँ 
क्योंकि चारों तरफ हैं सन्नाटा |


अंतरात्मा कहती है की
फिर छेड़ दू एक युद्ध 
पर मन है विचलित 
क्योंकि चारों तरफ है सन्नाटा |


अब नहीं पुकारती चीखें 
शायद मानवता की मृत्यु पर 
शोक मना रही हैं
क्योंकि चारों तरफ है सन्नाटा | 

धन्यवाद
मैं दिव्यान्ग्शु |

1 comment:

  1. bhavuk panktiyan! kintu manavta abhi mari nahi hai, bus hum use daba (supress) lete hain. kabhi khud mein to kabhi doosron ki.

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